गया (अशोक “अश्क”) गया जिला मुख्यालय से करीब 65 किलोमीटर दूर स्थित एक छोटा सा गांव “भोक्तौरी” आज भी विकास की बुनियादी जरूरतों से वंचित है। जंगलों और पहाड़ों से घिरे बांकेबाजार प्रखंड के तिलैया पंचायत में स्थित इस दलित बहुल गांव की पहचान अब एक ऐसी त्रासदी बन गई है, जो पीढ़ियों से यहां के निवासियों को निगल रही है। यहां का पानी जिंदगी देने की बजाय धीरे-धीरे शरीर को तोड़ रहा है।

भोक्तौरी गांव की सबसे बड़ी त्रासदी है फ्लोराइड युक्त पानी। गांव के करीब 25 घरों में 30 से ज्यादा लोग बौनापन और अंग विकृति जैसी गंभीर दिव्यांगता का शिकार हो चुके हैं। बच्चों के पैर टेढ़े, हड्डियां मुड़ी हुई और शरीर का विकास रुक गया है। इनकी चाल सीधी नहीं होती कोई लंगड़ाकर चलता है, कोई डंटे के सहारे, तो कोई झुककर।
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि 1990 के दशक तक लोग पास बहने वाली हड़ही नदी का पानी पीते थे, जिससे ऐसी कोई बीमारी नहीं होती थी। लेकिन जबसे गांव में चापाकल लगे और लोगों ने उसका पानी पीना शुरू किया, तबसे इस बीमारी ने अपने पैर पसार लिए। जानकारों की मानें तो इस पानी में फ्लोराइड की मात्रा अत्यधिक है, जो हड्डियों की संरचना को नुकसान पहुंचा रही है।
गांव के लोगों की पीड़ा यही नहीं रुकती। वे कहते हैं कि अगर कोई अजनबी गांव में आता है तो सभी उसे उम्मीद की नजरों से देखने लगते हैं, मानो कोई तारणहार आ गया हो। लेकिन हकीकत यह है कि अब तक किसी भी स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। गांव के लोग कभी-कभार बांकेबाजार अस्पताल जाकर दवाई जरूर ले आते हैं, जिससे अस्थायी राहत मिलती है, लेकिन समस्या की जड़ फ्लोराइड युक्त पानी से निजात के लिए न तो कोई योजना बनी है और न ही कोई स्थायी समाधान मिला है।
हालांकि हाल के वर्षों में इस बीमारी का असर कुछ हद तक कम जरूर हुआ है और नए जन्म लेने वाले बच्चे अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं, लेकिन पहले से प्रभावित बच्चों और युवाओं की स्थिति भयावह बनी हुई है। गांव के हर तीसरे व्यक्ति का शरीर झुका हुआ है, चलने की क्षमता सीमित हो चुकी है और जीवन की सामान्य धारा से वे कटे हुए हैं।
आज भी यह गांव एक फरिश्ते की प्रतीक्षा में है कोई ऐसा जो इनकी सुन सके, इनके लिए स्वच्छ पानी और इलाज की व्यवस्था करा सके और भोक्तौरी को एक सामान्य गांव बना सके। लेकिन सवाल यह है कि कब तक?

