समस्तीपुर, 27 अक्तूबर (समस्तीपुर डेस्क) छठ पर्व भारतीय संस्कृति के उन दुर्लभ उत्सवों में से एक है, जो धर्म से आगे बढ़कर जीवन, आस्था और मानवीय संवेदनाओं का प्रतीक बन गया है. यह पर्व न केवल सूर्य देव और छठी मइया की उपासना का माध्यम है, बल्कि अपने परिवार, समाज और जड़ों से जुड़ने की भावनाओं को फिर से जीवंत करता है.

आज जब लोग आधुनिकता की दौड़ में अपनी मिट्टी और परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं, छठ हमें याद दिलाता है कि अपनी संस्कृति से जुड़ाव ही असली पहचान है.

ये छठ जरूरी है उस माँ के लिए, जो महीनों से अपने बेटे के लौटने का इंतज़ार करती है; उस परिवार के लिए, जो शहरों में बंटकर रह गया है. यह पर्व दिखाता है कि घर सिर्फ चार दीवारों का ढांचा नहीं, बल्कि भावनाओं और अपनत्व का संगम है.
यह पर्व नई पीढ़ी को सिखाता है कि नदियाँ केवल किताबों का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन का स्रोत हैं. छठ समानता का ऐसा उत्सव है जहाँ बिना पुरोहित के पूजा होती है, और स्त्री-पुरुष दोनों श्रद्धा से सूर्य को नमन करते हैं. इसमें भेदभाव नहीं, केवल भक्ति और संतुलन की भावना होती है.
छठ उन परंपराओं को जीवित रखता है जो समाज के हर वर्ग को सम्मान देती हैं सूप-दऊरा बनाने वाले कारीगरों से लेकर गागर, नींबू और सुथनी तक, हर तत्व का अपना सांस्कृतिक महत्व है. यह पर्व बताता है कि हर हाथ, हर प्रयास, इस परंपरा को पूर्ण बनाता है. छठ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, नारी शक्ति और बिहार की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है.
यह पर्व सिखाता है कि संयमित और संतुलित व्यवहार ही सुखमय जीवन का आधार है और यही इसकी सबसे बड़ी सीख है।

