
पटना (अशोक “अश्क”) 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राजद सांसद सुरेंद्र यादव द्वारा दिए गए विवादित बयान पर सियासी बवाल मच गया है। बीजेपी और जदयू ने सुरेंद्र यादव के बयान को न केवल शर्मनाक बताया है, बल्कि इसे राष्ट्रविरोधी और लोकतंत्र का अपमान करार दिया है। बीजेपी प्रवक्ता दानिश इकबाल और जदयू प्रवक्ता अरविंद निषाद ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है और यादव से माफी की मांग की है। दरअसल, बिहार के जहानाबाद से राजद सांसद सुरेंद्र यादव ने 15 अगस्त को अपने घर पर झंडोत्तोलन के बाद एक विवादास्पद भाषण दिया। उन्होंने कहा, देश को दो लोग बेच रहे हैं और दो लोग खरीद रहे हैं। आने वाले 17 सालों में भारत की हालत श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से भी खराब हो जाएगी। भारत गुलामी की ओर बढ़ रहा है।
सुरेंद्र यादव यहीं नहीं रुके। उन्होंने कहा, जो लोग अंग्रेजों से माफी मांगते रहे, वे आज चालबाजी और पैसे के दम पर सत्ता में हैं। मैं ऐसे लोगों से नफरत करता हूं। गुजरात का कोई आदमी सेना में भर्ती नहीं होता। सभी घोटालेबाज गुजरात से ही हैं। आने वाले समय में देश में भाईचारा खत्म हो जाएगा और लोग एक-दूसरे की हत्या करेंगे। इस बयान पर भाजपा ने कड़ा ऐतराज जताया है। बीजेपी के मुख्य प्रवक्ता दानिश इकबाल ने कहा, राजद सांसद सुरेंद्र यादव का बयान सिर्फ शर्मनाक नहीं है, बल्कि यह देश की आजादी, लोकतंत्र और संविधान का अपमान है। भारत ने बीते 79 वर्षों में विज्ञान, तकनीक, अर्थव्यवस्था और सेना के क्षेत्र में जबरदस्त प्रगति की है। उसे गुलामी की ओर बढ़ता बताना, सुरेंद्र यादव के मानसिक दिवालियापन और राष्ट्रविरोधी सोच का संकेत है।
दानिश इकबाल ने आगे कहा कि बिहार की जनता राजद के कुशासन, भ्रष्टाचार और परिवारवाद से वाकिफ है। अब लोग इनके बहकावे में नहीं आएंगे। उन्होंने कहा कि यह वही सोच है जिसने बिहार को पिछड़ेपन की ओर धकेला था। जदयू प्रवक्ता अरविंद निषाद ने भी सुरेंद्र यादव पर हमला बोलते हुए कहा, जिन्हें यह तक याद नहीं कि देश को आजादी कब मिली, वे बिहार की जनता को ज्ञान देने चले हैं। उनके बयान पर न सिर्फ बिहार बल्कि पूरा देश हंस रहा है। यह आरजेडी की सोच और संस्कार का प्रतिबिंब है। सियासी हलकों में सुरेंद्र यादव के बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रिया जारी है। कई नेताओं ने इसे देश विरोधी करार दिया है और सांसद से माफी मांगने की मांग की है। विपक्ष की मांग है कि राजद को इस पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए। इस पूरे विवाद से एक बार फिर स्पष्ट हो गया है कि संवेदनशील राष्ट्रीय पर्व पर नेताओं को संयमित और जिम्मेदाराना भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि उनके शब्द समाज और देश को प्रभावित करते हैं।

