सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “वर्दी पहनते ही पुलिस को छोड़ना होगा धार्मिक पूर्वाग्रह”, अकोला दंगे में SIT गठित करने का आदेश

नई दिल्ली, 12 सितम्बर (अशोक “अश्क”) सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 2023 में महाराष्ट्र के अकोला में हुए सांप्रदायिक दंगों के एक हत्या मामले में पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं और सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि पुलिस अधिकारियों को वर्दी पहनते ही अपने व्यक्तिगत और धार्मिक पूर्वाग्रहों को त्याग देना चाहिए।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने न सिर्फ महाराष्ट्र पुलिस की लापरवाही पर नाराज़गी जताई, बल्कि एक विशेष जांच दल के गठन का आदेश भी दिया, जिसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शामिल होंगे।


पुलिस पर कर्तव्यहीनता का आरोप:
कोर्ट ने पाया कि अकोला में दंगे के दौरान विलास महादेवराव गायकवाड़ की हत्या के प्रत्यक्षदर्शी के बयान को नजरअंदाज कर दिया गया और पुलिस ने प्राथमिकी भी दर्ज नहीं की। कोर्ट ने महाराष्ट्र के गृह विभाग के सचिव को निर्देश दिया कि वे एक निष्पक्ष SIT गठित करें जो पूरे मामले की नए सिरे से जांच करेगी और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करेगी।
पीठ ने सख्त लहजे में कहा, “जब कोई पुलिसकर्मी वर्दी पहनता है, तो उसे अपने सभी व्यक्तिगत झुकाव और धार्मिक या जातीय पूर्वाग्रहों को छोड़ देना चाहिए। दुर्भाग्यवश, इस मामले में ऐसा नहीं हुआ।”
मई 2023 में अकोला के पुराने शहर क्षेत्र में पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ एक आपत्तिजनक पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी। इस हिंसा में विलास गायकवाड़ की मौत हो गई थी और याचिकाकर्ता मोहम्मद अफज़ल मोहम्मद शरीफ समेत आठ लोग घायल हो गए थे।
अफज़ल ने याचिका में कहा कि चार लोगों ने गायकवाड़ को मुसलमान समझकर तलवार, लोहे की छड़ और अन्य हथियारों से हमला कर हत्या कर दी। उन्होंने यह भी दावा किया कि वे खुद इस हमले के प्रत्यक्षदर्शी हैं और हमलावरों में से एक को पहचान सकते हैं। अफज़ल ने कहा कि उन्हें भी जानलेवा हमले में गंभीर चोटें आई थीं और वे अस्पताल में भर्ती रहे, लेकिन पुलिस ने उनका बयान दर्ज करने के बावजूद FIR दर्ज नहीं की।
पुलिस की सफाई और सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया
महाराष्ट्र पुलिस ने कोर्ट में दलील दी कि अफज़ल के प्रत्यक्षदर्शी होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला। उनका यह भी दावा था कि जब पुलिस अफज़ल से मिलने अस्पताल गई, तो वे बयान देने की स्थिति में नहीं थे।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि पुलिस अधिकारियों ने अपने कर्तव्य में घोर लापरवाही बरती। कोर्ट ने गृह सचिव को निर्देश दिया कि जिन पुलिसकर्मियों ने लापरवाही की है, उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।

तीन महीने में रिपोर्ट देने का आदेश
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SIT को तीन महीने के भीतर अपनी जांच रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश करनी होगी। साथ ही, पुलिस विभाग के सभी कर्मियों को संवेदनशील और निष्पक्ष कार्यप्रणाली के लिए प्रशिक्षित करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
पीठ ने यह भी कहा कि पुलिस ने एक नाबालिग (17 वर्षीय) प्रत्यक्षदर्शी द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों की उचित जांच नहीं की, जोकि न्याय प्रक्रिया का गंभीर उल्लंघन है।
यह मामला न केवल एक दंगे में न्यायिक निष्पक्षता की परीक्षा है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि पुलिस तंत्र में निष्पक्षता और जवाबदेही कितनी महत्वपूर्ण है, विशेषकर सांप्रदायिक मामलों में।

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