
पटना, 07 मार्च (अविनाश कुमार) करीब दो दशक तक बिहार की सत्ता पर काबिज रहे नीतीश कुमार ने 75 वर्ष की उम्र पार करने के बाद अपने राजनीतिक सफर को नया मोड़ देने का संकेत दिया है। अब वे सक्रिय राजनीति में राज्यसभा के जरिए अपनी भूमिका निभाने की रणनीति पर आगे बढ़ते दिख रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि लगभग 20 साल मुख्यमंत्री रहने के बावजूद उन्होंने इस दौरान एक बार भी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा।

नीतीश कुमार का विधानसभा चुनावी इतिहास भी काफी सीमित रहा है। उन्होंने केवल तीन बार—1977, 1980 और 1985 में—विधानसभा चुनाव लड़ा। इनमें उन्हें सिर्फ 1985 में ही जीत मिली। इसके बाद उन्होंने राज्य की राजनीति से आगे बढ़ते हुए राष्ट्रीय राजनीति का रुख किया और दिल्ली की सत्ता की ओर कदम बढ़ाया।लोकसभा चुनावों में उनका रिकॉर्ड अपेक्षाकृत बेहतर रहा। उन्होंने 1989, 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में लोकसभा चुनाव लड़ा। 1989 से लगातार चार बार वे बिहार के बाढ़ क्षेत्र से सांसद चुने गए। हालांकि 2004 में उन्हें बाढ़ से हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उसी चुनाव में नालंदा से जीतकर उन्होंने संसद में अपनी मौजूदगी बरकरार रखी। इसके बाद वे कभी सीधे चुनावी मैदान में नहीं उतरे।

नीतीश कुमार का राजनीति से जुड़ाव छात्र जीवन से ही शुरू हो गया था। इंजीनियरिंग के छात्रों की बेरोजगारी के खिलाफ उन्होंने बड़ा आंदोलन चलाया था और 1974 के छात्र आंदोलन में छात्र संघ नेता के तौर पर काफी सक्रिय रहे।पत्रकार अरुण सिंहा की किताब Nitish Kumar and the Rise of Bihar के अनुसार, शुरुआत में नीतीश खुद चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं थे। बाद में पत्नी के समझाने पर उन्होंने चुनावी राजनीति में कदम रखा।उनकी निजी जिंदगी भी अपने फैसलों को लेकर चर्चा में रही। छात्र जीवन में तय हुई शादी के दौरान उन्होंने दहेज और पारंपरिक कर्मकांडों का विरोध किया और साफ कर दिया कि विवाह केवल माला बदलकर और सादगी से सार्वजनिक हॉल में होगा। उनकी इस जिद के आगे आखिरकार दोनों परिवारों को झुकना पड़ा।

