
काठमांडू,विशेष संवाददाता। नेपाल के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल मुक्तिनाथ धाम के आसपास काली गंडकी नदी के तट से मिला करीब 31 टन वजनी विशाल शालिग्राम पत्थर धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक और भूवैज्ञानिक दृष्टि से भी चर्चा का विषय बना हुआ है। इस विशाल शिला को दुनिया के सबसे बड़े शालिग्रामों में से एक माना जा रहा है। जबकि विशेषज्ञों द्वारा इसकी उम्र करीब 17.5 करोड़ वर्ष आंकी गई है। बता दें कि शालिग्राम को सनातन धर्म में भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है। नेपाल की काली गंडकी नदी में प्राकृतिक रूप से मिलने वाले ये जीवाश्म पत्थर श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पवित्र माने जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार शालिग्राम की पूजा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। यही वजह है कि काली गंडकी नदी और इसके आसपास का क्षेत्र सदियों से हिंदू श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र रहा है।
-तीन वर्ष पहले काली गंडकी से ही अयोध्या तक पहुंची थी विशाल शिला
फरवरी 2023 में नेपाल से अयोध्या तकरीबन 31 टन वजनी इस विशाल शालिग्राम को
लाया गया था। शिला को अयोध्या लाने से पहले नेपाल में धार्मिक विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद इसे विशेष वाहन के जरिए भारत लाया गया। रास्ते में भी कई स्थानों पर श्रद्धालुओं ने इस शिला के दर्शन किए और स्वागत किया।
इस शिला को अयोध्या लाने का उद्देश्य भगवान राम लक्ष्मण व माता जानकी की प्रतिमाओं के निर्माण के लिए इसका उपयोग करना बताया गया था। विशाल शिला के अयोध्या पहुंचने की खबर ने देशभर में लोगों का ध्यान आकर्षित किया था। शिला के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी जुटे थे।
-क्यों इतना महत्वपूर्ण है, शालिग्राम
शालिग्राम कोई साधारण पत्थर नहीं है। ये प्राकृतिक रूप से बने जीवाश्म होते हैं,जिन पर लाखों-करोड़ों वर्षों में प्राकृतिक संरचनाएं विकसित होती हैं। काली गंडकी नदी में पाए जाने वाले शालिग्राम विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। इनमें अक्सर गोलाकार आकृतियां और प्राकृतिक चिह्न दिखाई देते हैं, जिन्हें धार्मिक दृष्टि से भगवान विष्णु के विभिन्न स्वरूपों से जोड़ा जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों और परंपराओं में शालिग्राम की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। नेपाल के मुक्तिनाथ क्षेत्र में शालिग्राम मिलने के कारण इस पूरे इलाके का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। मुक्तिनाथ धाम हिंदू और बौद्ध दोनों समुदायों के लिए महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है।
-17.5 करोड़ वर्ष पुरानी शिला ने बढ़ाई उत्सुकता
विशाल शालिग्राम की उम्र करीब 17.5 करोड़ वर्ष आंके जाने की बात इसे और खास बनाती है। यदि यह अनुमान सही है तो यह शिला पृथ्वी के बेहद प्राचीन भूवैज्ञानिक इतिहास की गवाह मानी जाएगी। करोड़ों वर्षों तक प्राकृतिक प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद नदी के प्रवाह के साथ इसका वर्तमान स्वरूप सामने आया होगा। धार्मिक आस्था व वैज्ञानिक जिज्ञासा का यह अनोखा संगम इस शिला को खास बनाता है। एक ओर श्रद्धालुओं के लिए यह भगवान विष्णु का पवित्र स्वरूप है, वहीं दूसरी ओर भूवैज्ञानिक दृष्टि से यह करोड़ों वर्ष पुराने प्राकृतिक जीवाश्म की अहम मिसाल मानी जा रही है।
-नेपाल और अयोध्या के बीच आस्था का सेतु
काली गंडकी की धरती से 3 वर्ष पहले अयोध्या तक पहुंची इस विशाल शिला ने नेपाल और भारत के बीच सदियों पुराने धार्मिक और सांस्कृतिक संबंधों को भी रेखांकित किया। मुक्तिनाथ और अयोध्या दोनों ही सनातन परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ हैं। ऐसे में इस विशाल शालिग्राम का अयोध्या पहुंचना श्रद्धालुओं के लिए भावनात्मक और धार्मिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
















