नई दिल्ली, 27 सितंबर (अशोक “अश्क”) सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को स्पष्ट कर दिया कि यदि किसी व्यक्ति का नाम एक से अधिक मतदाता सूचियों में दर्ज है, तो वह चुनाव लड़ने का अधिकारी नहीं है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने उत्तराखंड राज्य निर्वाचन आयोग की याचिका खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने आयोग पर 2 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया और तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा कि वह कैसे वैधानिक प्रावधानों के विपरीत जा सकता है।

मामला उत्तराखंड हाई कोर्ट के जुलाई 2024 के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें आयोग के स्पष्टीकरण को प्रथम दृष्टया गलत करार देते हुए उस पर रोक लगाई गई थी। आयोग ने कहा था कि किसी उम्मीदवार का नामांकन पत्र केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जाएगा कि उसका नाम एक से अधिक ग्राम पंचायतों या निकायों की मतदाता सूचियों में दर्ज है।
हाई कोर्ट ने कहा था कि उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम, 2016 की धारा 9 की उपधारा (6) और (7) के अनुसार, एक व्यक्ति एक से अधिक मतदाता सूची में पंजीकृत नहीं हो सकता। इसके बावजूद निर्वाचन आयोग ने जो स्पष्टीकरण जारी किया, वह कानून के खिलाफ प्रतीत होता है।
उपधारा (6) में प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति एक से अधिक प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों की मतदाता सूची में पंजीकृत नहीं हो सकता, जबकि उपधारा (7) में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति नगर निगम, नगर पालिका या नगर पंचायत की मतदाता सूची में पंजीकृत है, तो वह तब तक किसी अन्य क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज नहीं हो सकता जब तक पूर्व सूची से उसका नाम हटाया न गया हो।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के निर्णय को सही ठहराते हुए कहा कि यह एक वैधानिक रोक है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि निर्वाचन आयोग का स्पष्टीकरण कानून के विपरीत है और इस पर रोक लगाना आवश्यक था।
इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि चुनाव लड़ने के लिए मतदाता का नाम केवल एक ही स्थान की मतदाता सूची में होना अनिवार्य है।

