“द ताज स्टोरी” — इतिहास, रहस्य और विचारों का संगम

नई दिल्ली, 01 नवम्बर (अशोक “अश्क”) परेश रावल की “द ताज स्टोरी” सिनेमाघरों में रिलीज़ हो चुकी है फिल्म का निर्देशन तुषार गोयल ने किया है। सही मायनी में “द ताज स्टोरी” एक साहसिक, विचारोत्तेजक और बौद्धिक फिल्म है, जो इतिहास और विश्वास के बीच चल रही बहस को पर्दे पर जीवंत करती है। फिल्म की कहानी आगरा के टूर गाइड विष्णुदास (परेश रावल) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो ताजमहल की दास्तान सैलानियों को सुनाते-सुनाते खुद उसकी सच्चाई पर सवाल उठाने लगता है।

फिल्म का असली मोड़ तब आता है जब विष्णुदास, इस विश्वविख्यात स्मारक ताजमहल पर मुकदमा दर्ज कर देता है। यही से शुरू होती है अदालत की एक तीखी जंग, जो इतिहास बनाम इतिहास की व्याख्या की।फिल्म का बड़ा हिस्सा कोर्टरूम के ड्रामा में बीतता है, जहां विष्णुदास अपने तर्कों से ताजमहल के बनने और उसके छिपे पहलुओं पर सवाल उठाते हैं। दूसरी ओर, एडवोकेट अन्वर रशीद (जाकिर हुसैन) परंपरागत इतिहास का बचाव करते हैं। दोनों के बीच चलने वाली बहसें न केवल कानूनी दलीलों तक सीमित रहती हैं, बल्कि दर्शकों के भीतर भी एक वैचारिक मंथन शुरू कर देती हैं।तुषार गोयल ने विषय को बड़ी निडरता और संवेदनशीलता के साथ पेश किया है। यह फिल्म किसी धार्मिक या राजनीतिक एजेंडे को नहीं थोपती, बल्कि दर्शकों को सोचने और अपनी राय बनाने का मौका देती है। खासकर ताजमहल के 22 बंद कमरों पर आधारित रहस्य को निर्देशक ने सस्पेंस और तथ्य के बीच बखूबी संतुलित किया है।परेश रावल फिल्म की रीढ़ हैं। उन्होंने विष्णुदास के किरदार में गंभीरता, व्यंग्य और मानवीय संवेदना का अद्भुत मेल दिखाया है।जाकिर हुसैन अपने तर्कशील और दृढ़ वकील के रूप में प्रभाव छोड़ते हैं। उनका शांत किंतु आत्मविश्वास भरा अभिनय अदालत के दृश्यों को वास्तविक बनाता है।सहायक कलाकारों में अमृता खानविलकर, नमित दास और स्नेहा वाघ ने कहानी में भावनात्मक और मानवीय परतें जोड़ी हैं। वहीं अखिलेंद्र मिश्रा, बिजेंद्र काला, शिशिर शर्मा और अनिल जॉर्ज जैसे अनुभवी कलाकारों ने कहानी को मजबूती दी है।फिल्म का स्क्रीनप्ले और संवाद इसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। कुछ संवाद तो सीधे दिल और दिमाग में उतर जाते हैं। जो फिल्म के मूल विचार को बखूबी समेटती है।संगीत और तकनीकी पहलू भी ठीक-ठाक ही है। कैलाश खेर और जावेद अली की आवाज़ में गाए गए गीत कहानी के भावों को और गहराई देते हैं। सिनेमैटोग्राफी में ताजमहल की भव्यता, रोशनी और छायाओं के माध्यम से उसके रहस्य को खूबसूरती से उभारा गया है। परेश रावल की शानदार अदाकारी, तुषार गोयल का साहसी निर्देशन और ताजमहल की रहस्यमयी कहानी को नए दृष्टिकोण से दिखाने का प्रयास इन सबके मेल से यह फिल्म देखने योग्य बनता है। अगर फिल्म के रेटिंग की बात करें तो फिल्म को 2.5 स्टार्स मिलने चाहिए

~ अशोक “अश्क”

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