बक्सर, 18 दिसंबर (विक्रांत) ममतामयी मां की उपाधि से विख्यात धरिक्षणा कुंअरि दानशीलता, त्याग और राष्ट्रभक्ति की ऐसी मिसाल हैं, जिनकी गूंज आज भी पुराना शाहाबाद जिला से लेकर पटना और वाराणसी तक सुनाई देती है। उनकी दानवीरता केवल कथाओं तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के रूप में आज भी जीवंत है।स्वाधीनता आंदोलन के दौर में देशभक्ति उनकी रग-रग में बसी थी।

वर्ष 1932 में महात्मा गांधी के बक्सर आगमन पर धरिक्षणा कुंअरि ने अपने दोनों हाथों के सोने के कंगन सहित कई स्वर्णाभूषण आजादी की लड़ाई में दान कर दिए। इतिहास इस महान त्याग का साक्षी है।शिक्षा के प्रति उनका जुनून अद्भुत था। वर्ष 1936 में उन्होंने बक्सर अनुमंडल मुख्यालय में मध्य विद्यालय की स्थापना की। जून 1956 में धरिक्षणा कुंअरि महाविद्यालय (डी.के. कॉलेज) की नींव रखी। अपनी ससुराल डुमरी गांव में डी.के. मेमोरियल कॉलेज, बक्सर में पति स्व. श्रीकृष्ण प्रसाद की स्मृति में विद्यालय और यात्रियों के लिए धर्मशाला का निर्माण कराया। आज उसी परिसर में विद्यालय संचालित है।भोजपुर जिले के कोईलवर में टीबी सेनेटोरियम की स्थापना की, जो आज मानसिक आरोग्यशाला के रूप में कार्यरत है। पटना में सब्जी मंडी के पास धर्मशाला, वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय में नकद दान से छात्र कल्याण कोष की स्थापना भी उनके महान कार्यों में शामिल है। इन संस्थानों से आज भी हर वर्ष हजारों जरूरतमंद लाभान्वित हो रहे हैं।जीवन में पति और पुत्र के असमय निधन का गहरा आघात सहने के बावजूद उनकी दानवीरता कम नहीं हुई। वरिष्ठ नागरिकों का कहना है कि स्वयं अनपढ़ रहते हुए भी उन्होंने शिक्षा की मशाल जलाई। वंशज पवन कुमार साह ने चिंता जताई कि सरकार उनकी स्मृतियों को संजो नहीं सकी, जिससे नई पीढ़ी उन्हें भूलती जा रही है।

