नई दिल्ली 28अगस्त (अशोक “अश्क”) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सप्ताह के अंत में चीन की यात्रा पर रवाना होने वाले हैं, जहां वे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक तनाव अपने चरम पर है। हाल ही में अमेरिका ने भारत पर टैरिफ दरें दोगुनी करते हुए 50% तक पहुंचा दी हैं, जो अब तक किसी भी एशियाई देश पर सबसे ऊंची दर है। वहीं, चीन पर यह दर महज 30% है।

प्रधानमंत्री मोदी की इस रणनीतिक यात्रा से वॉशिंगटन में हलचल मच गई है। अमेरिका की योजना टैरिफ के माध्यम से भारत पर दबाव बनाने की थी, लेकिन नई दिल्ली द्वारा SCO शिखर सम्मेलन में चीन की सरजमीं पर मौजूदगी दर्ज कराना अमेरिकी रणनीति को चुनौती देने जैसा देखा जा रहा है।
इस घटनाक्रम से खफा होकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वरिष्ठ ट्रेड सलाहकार पीटर नवारो ने पीएम मोदी के चीन दौरे की कड़ी आलोचना की है। ब्लूमबर्ग टीवी को दिए एक साक्षात्कार में नवारो ने तीखा हमला बोलते हुए कहा, “भारत अब तानाशाही देशों के साथ मिल रहा है। चीन, जिसने अक्साई चिन और अन्य विवादित क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया है, वह भारत का मित्र नहीं हो सकता।”
नवारो ने यहां तक कह दिया कि भारत रूस के साथ भी गहरे संबंध बनाकर लोकतांत्रिक मूल्यों से दूर जा रहा है। उन्होंने भारत पर यह आरोप लगाया कि वह सस्ती दरों पर रूसी तेल खरीदकर यूक्रेन युद्ध में अप्रत्यक्ष रूप से रूस का समर्थन कर रहा है। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा, “मैं इसे मोदी का युद्ध कहता हूं, क्योंकि इस युद्ध को रोकने का रास्ता नई दिल्ली से होकर गुजरता है।”
यह इंटरव्यू ठीक उसी दिन सामने आया जब अमेरिका ने भारत पर 50% टैरिफ की घोषणा की। इस टैरिफ का सीधा असर भारतीय निर्यात के 55% हिस्से पर पड़ रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स और दवाओं को कुछ छूट दी गई है, लेकिन कपड़ा, आभूषण जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों पर इसका नकारात्मक प्रभाव देखा जा रहा है।
नवारो ने कहा, “भारत जो कर रहा है, उससे अमेरिका में हर कोई हार रहा है। उपभोक्ता, व्यवसाय, कर्मचारी। यहां तक कि करदाताओं को भी नुकसान हो रहा है, क्योंकि हमें मोदी के युद्ध के लिए धन जुटाना पड़ रहा है।”
मोदी की यह चीन यात्रा न केवल SCO मंच पर भारत की भागीदारी के लिहाज से अहम है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि भारत किसी एक ध्रुव पर झुकने के बजाय बहुध्रुवीय कूटनीति का समर्थन करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह दांव अमेरिका को उसके मौजूदा रवैये पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकता है।
अब देखना यह है कि क्या पीएम मोदी इस यात्रा के दौरान वैश्विक समीकरणों में कोई नया संतुलन स्थापित कर पाएंगे, या फिर यह अमेरिका-भारत संबंधों में नई दरार को जन्म देगा।

