अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने H-1B वीजा पर भारी फीस लगाई, भारतीयों पर पड़ेगा असर

नई दिल्ली, 22 सितम्बर (अशोक “अश्क”) अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B वीजा पर सालाना 1 लाख डॉलर (लगभग 88 लाख रुपये) की भारी फीस लगाने का फैसला लिया है। उनका उद्देश्य अमेरिकी कंपनियों को विदेशी स्किल्ड वर्कर्स को काम पर रखने से रोकना और उनके बजाय अमेरिकी नागरिकों को रोजगार देने के लिए प्रेरित करना है। इस कदम का सबसे बड़ा असर भारतीयों पर पड़ेगा, जिन्हें H-1B वीजा से सबसे अधिक लाभ मिलता आया है।


ट्रंप का यह फैसला अमेरिका में बेरोजगारी को कम करने और नौकरी की संभावनाओं को अमेरिकी नागरिकों तक सीमित करने के उद्देश्य से लिया गया है। उनका कहना है कि यह कदम अमेरिकी श्रमिकों को प्राथमिकता देने के लिए उठाया गया है। H-1B वीजा पर लागू की गई भारी फीस का असर खासतौर पर भारतीय आईटी पेशेवरों पर पड़ेगा, क्योंकि इस वीजा का सबसे ज्यादा उपयोग भारतीय वर्कर्स करते हैं।
हालांकि, यह कदम अमेरिकी कंपनियों के लिए चिंता का कारण बन गया है। अमेरिकी चैंबर ऑफ कॉमर्स ने इस फैसले पर चिंता व्यक्त की है और कहा है कि वे इस कदम के असर को समझने के लिए ट्रंप सरकार के साथ चर्चा कर रहे हैं।
H-1B वीजा मुख्य रूप से अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनियों को दूसरे देशों से प्रतिभाशाली कर्मचारियों को काम पर रखने में मदद करता है। यदि इस वीजा पर यह भारी शुल्क लागू होता है, तो अमेरिकी कंपनियां अपने जॉब हायरिंग प्रोसेस को बदलने पर मजबूर हो सकती हैं। खासतौर पर छोटे स्टार्टअप्स के लिए यह एक बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि वे बड़ी कंपनियों की तरह इतनी फीस चुकाने में सक्षम नहीं होंगे।
इससे न केवल तकनीकी क्षेत्र, बल्कि मेडिकल, मैन्युफैक्चरिंग और शैक्षिक संस्थानों पर भी असर पड़ेगा, जो H-1B वीजा के जरिए विदेशी विशेषज्ञों को नियुक्त करते हैं। ट्रंप सरकार के इस फैसले से अमेरिकी अर्थव्यवस्था और कॉरपोरेट सेक्टर को लंबी अवधि में नुकसान हो सकता है।
H-1B वीजा की फीस बढ़ाने के बाद, कंपनियां एल-1 वीजा का अधिक इस्तेमाल कर सकती हैं। एल-1 वीजा का इस्तेमाल कंपनी के अंदर ट्रांसफर के लिए किया जाता है, जबकि H-1B वीजा नए कर्मचारियों की भर्ती के लिए होता है। इसमें कोई सीमा नहीं है, लेकिन ट्रंप प्रशासन इसकी जांच कर सकता है, क्योंकि बड़ी कंपनियां इसका भी बड़े पैमाने पर उपयोग करती हैं।
इस स्थिति में, भारत सरकार भी सक्रिय है। भारतीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल अमेरिका यात्रा पर जा रहे हैं, जहां वे व्यापार समझौतों के अलावा H-1B वीजा के मुद्दे को भी अमेरिकी प्रतिनिधियों के सामने उठा सकते हैं। दोनों देशों के बीच इस विवाद का जल्दी समाधान निकलने की उम्मीद है, क्योंकि इससे दोनों देशों के लिए नुकसान हो सकता है।
भारत में मल्टीनेशनल कंपनियां ग्लोबल कैपेबिलिटीज सेंटर (GCC) में बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं, और अगर H-1B वीजा पर सख्ती लगती है, तो ये कंपनियां भारत में और अधिक हायरिंग कर सकती हैं।

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