पाकिस्तान में फिर मंडराया सैन्य तख्तापलट का साया, सेना प्रमुख असीम मुनीर पर उठने लगे सवाल

नई दिल्ली (अशोक “अश्क”) पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के बाद से ही उसकी सेना देश की सबसे मजबूत संस्था बनी हुई है। इतिहास गवाह है कि पाकिस्तानी सेना ने न केवल सरकारों और राजनीतिक फैसलों में दखल दिया है, बल्कि कई बार खुद सत्ता पर सीधा कब्जा भी किया है। अयूब खान, जिया उल हक और परवेज मुशर्रफ जैसे सैन्य तानाशाह इस देश के इतिहास में सत्ता पलट के प्रतीक रहे हैं। अब एक बार फिर सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर को लेकर पाकिस्तान के राजनीतिक गलियारों से लेकर मीडिया तक अटकलों का बाजार गर्म है।


हाल के दिनों में भारत के साथ तनाव के चलते असीम मुनीर की लोकप्रियता और ताकत में जबरदस्त इजाफा हुआ है। पाकिस्तान की मौजूदा शहबाज शरीफ सरकार उनके सामने एक कमजोर और लगभग कठपुतली सरकार के रूप में देखी जा रही है। यही कारण है कि पाकिस्तान में असीम मुनीर द्वारा सत्ता पर कब्जा करने की अफवाहें जोर पकड़ रही हैं।
पाकिस्तान की अखबारों ने भी इन आशंकाओं पर खुलकर लिखा है। एक अखबार ने अपने संपादकीय में लिखा कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि असीम मुनीर को खुद इन अफवाहों का खंडन करना पड़ा है। यह स्थिति इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान में नागरिक सरकारें कितनी कमजोर हैं और सेना कितनी शक्तिशाली।
पाकिस्तान के एक प्रमुख अखबार के लेख में साफ कहा गया है कि देश की राजनीतिक स्थिति इतनी जर्जर है कि लोगों को सेना का दखल एक विकल्प के रूप में दिखाई देने लगा है। लेख में यह भी बताया गया कि पाकिस्तान पिछले कई वर्षों से राजनीतिक अस्थिरता और अव्यवस्था से जूझ रहा है। ऐसे माहौल में सेना की छाया में सरकार चलाना एक मजबूरी बन गया है।
कई अखबारों ने नागरिक नेताओं की विफलता की ओर इशारा करते हुए लिखा है कि राजनीतिक नेतृत्व बार-बार सेना के सामने झुकता रहा है और यही कारण है कि सैन्य दखल की जमीन तैयार होती रही है। सेना प्रमुख असीम मुनीर को फील्ड मार्शल के पद पर पदोन्नत किए जाने की चर्चा भी इसी संदर्भ में देखी जा रही है। यह न केवल उनके बढ़ते वर्चस्व का संकेत है बल्कि यह भी दिखाता है कि नागरिक सरकार किस हद तक झुक चुकी है।
पाकिस्तान की मीडिया और विश्लेषकों का मानना है कि सरकार भले ही राजनीतिक स्थिरता का दावा कर रही हो, लेकिन जमीन पर सच्चाई अलग है। आर्थिक मोर्चे पर पाकिस्तान गंभीर संकट से गुजर रहा है। महंगाई, बेरोजगारी और विदेशी कर्ज के बोझ से जनता त्रस्त है।
आर्थिक सुधार के कोई ठोस संकेत नजर नहीं आ रहे हैं, जिससे जनता का आक्रोश लगातार बढ़ रहा है। डॉन के लेख में चेतावनी दी गई है कि यदि सरकार जल्दी ही कोई समाधान नहीं निकाल पाई, तो जनता सड़कों पर उतर सकती है। इस स्थिति में सेना को एक बार फिर से व्यवस्था संभालने के नाम पर दखल देने का मौका मिल सकता है।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान एक और सैन्य तख्तापलट की ओर बढ़ रहा है? और अगर हां, तो क्या इस बार भी देश की राजनीति सैन्य जूतों के नीचे रौंदी जाएगी? ये सवाल आज हर पाकिस्तानी नागरिक और विश्लेषक के मन में गूंज रहा है।

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