बिहार चुनाव: जब टमटम-बैलगाड़ी से चलता था प्रचार, भूजा-सत्तू से मिटती थी भूख

पटना, 12 सितम्बर (अशोक “अश्क”) बिहार की राजनीति का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही दिलचस्प भी। बिहार चुनाव 2025 की सरगर्मी के बीच अतीत की कुछ भूली-बिसरी यादें फिर से ताज़ा हो रही हैं। आज जहां चुनाव प्रचार में हाईटेक साधनों, हेलीकॉप्टर, सोशल मीडिया और करोड़ों की खर्चीली रैलियों का बोलबाला है, वहीं एक दौर ऐसा भी था जब नेता बैलगाड़ी, टमटम और साइकिल से प्रचार करने निकलते थे।


1952 का पहला आम चुनाव, जब बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह (श्री बाबू) ने बिना किसी तामझाम के चुनाव लड़ा और जीता। न हेलीकॉप्टर, न भारी-भरकम प्रचार रथ सिर्फ सादगी, ईमानदारी और जनता से सीधा संवाद। श्री बाबू का मानना था कि अगर कोई नेता पांच साल तक जनता के लिए ईमानदारी से काम करता है, तो उसे वोट मांगने की जरूरत नहीं पड़ती। यही वजह थी कि वे कभी कोई चुनाव नहीं हारे।
1950 और 60 के दशक में चुनाव प्रचार का तरीका बहुत सीधा और जमीन से जुड़ा हुआ था। नेता गांव-गांव बैलगाड़ी या टमटम से पहुंचते थे। उनके साथ कुछ समर्थक होते थे, जो नारे लगाते हुए चलते थे। गाड़ियों की संख्या कम और सड़कों की स्थिति खराब होने के कारण यह साधन प्रचार के लिए बेहतर माने जाते थे।
सभा या रैलियों में लोग पैदल ही पहुंचते थे। भूख लगने पर रास्ते में साथ लाए सत्तू, नींबू-नमक या भूजा खाकर काम चला लेते थे। मंच, माइक और एलईडी स्क्रीन जैसी चीजों का कोई अस्तित्व नहीं था। खर्च न के बराबर होता था और चुनाव आयोग की भी सख्त निगरानी नहीं होती थी। एक पूरा चुनाव पांच से दस हजार रुपये में निपट जाता था।
वर्तमान में चुनाव प्रचार पूरी तरह से बदल गया है। अब हर प्रत्याशी सोशल मीडिया, डिजिटल प्रचार, महंगे वाहनों और आधुनिक तकनीक के सहारे जनता तक पहुंचने की कोशिश करता है। बड़े नेता हेलीकॉप्टर और चार्टर्ड फ्लाइट्स में एक दिन में कई सभाएं करते हैं। एक-एक रैली का खर्च लाखों में होता है।
चुनावी मंच आज भव्य हो चुके हैं, जिनमें साउंड सिस्टम, एलईडी स्क्रीन, हजारों कुर्सियां और अलग-अलग एंट्रेंस शामिल होते हैं। इन सबका कुल खर्च करोड़ों में पहुंच जाता है। सोशल मीडिया भी चुनावी जंग का एक महत्वपूर्ण हथियार बन चुका है, जहां उम्मीदवार अपनी छवि संवारते हैं और विपक्ष पर निशाना साधते हैं।
गांव के बुजुर्ग आज भी उस दौर को याद करते हैं जब चुनाव में दिखावा नहीं, भरोसा चलता था। जब नेता आम जनता के बीच बैठते थे, उनके साथ भूजा खाते थे और सादा जीवन जीते थे। श्री बाबू जैसे नेता आज भले ही न हों, लेकिन उनकी सादगी और सिद्धांत आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं।
बिहार चुनाव भले ही तकनीक और चमक-धमक की दौड़ में शामिल हो चुका हो, लेकिन इसकी आत्मा आज भी उन बैलगाड़ियों और सत्तू की पोटलियों में छिपी है, जो कभी लोकतंत्र की असली पहचान थीं।

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