नई दिल्ली, 18 अक्तूबर (अशोक “अश्क”) जहां ज्यादातर मॉडल्स और अभिनेत्रियों का सपना बॉलीवुड की चमक-धमक में चमकने का होता है, वहीं एक नाम ऐसा भी है जिसने फिल्मी दुनिया की चकाचौंध को छोड़कर आध्यात्म की राह चुनी। हम बात कर रहे हैं बरखा मदान की 1994 की मिस इंडिया फाइनलिस्ट, जिन्होंने सुष्मिता सेन और ऐश्वर्या राय के साथ मंच साझा किया था।

बरखा ने मॉडलिंग से बॉलीवुड का सफर शुरू किया और 1996 में अक्षय कुमार के साथ ‘खिलाड़ियों का खिलाड़ी’ से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। यह फिल्म सुपरहिट रही और बरखा को स्टारडम मिला। इसके बाद उन्होंने पंजाबी और हॉलीवुड फिल्मों में भी काम किया। राम गोपाल वर्मा की ‘भूत’ में उनका किरदार खासा चर्चित रहा।

हालांकि फिल्मों की सफलता, पैसा और शोहरत सब कुछ होने के बावजूद बरखा के भीतर एक खालीपन था। धर्मशाला के बौद्ध मठों की यात्राओं के दौरान उन्हें शांति की अनुभूति हुई और धीरे-धीरे उनका झुकाव बौद्ध धर्म की ओर बढ़ता गया। उन्होंने 2010 में ‘सोच लो’ और 2014 में ‘सुरखाब’ जैसी फिल्मों का निर्माण और अभिनय किया, लेकिन ‘सुरखाब’ उनकी आखिरी फिल्म साबित हुई।
फिल्म की शूटिंग के दौरान ही उन्होंने बौद्ध भिक्षुणी बनने का निर्णय ले लिया। अब वह ‘ग्यालटेन समतेन’ नाम से जानी जाती हैं, जिसका तिब्बती भाषा में अर्थ है ध्यान की विजयी अवस्था।
बरखा अब तिब्बत और नेपाल के बौद्ध आश्रमों में गेरुआ वस्त्र पहनकर, सिर मुंडवाकर, एक साध्वी का जीवन जी रही हैं। दुनियावी सुखों को त्याग चुकीं बरखा आज ध्यान, बौद्ध दर्शन और आत्मिक शांति के पथ पर अग्रसर हैं एक ऐसी कहानी जो न केवल प्रेरक है, बल्कि आत्म-अन्वेषण का अनूठा उदाहरण भी है।

