नई दिल्ली, 27 अक्तूबर (अशोक “अश्क”) भारतीय सिनेमा की कहानी की शुरुआत 1913 में बनी राजा हरिश्चंद्र से हुई थी एक ऐसी फिल्म जिसने देश में चलचित्रों की नींव रखी। आने वाले तीन दशकों तक सिनेमा की दुनिया ब्लैक एंड व्हाइट फ्रेम्स तक ही सीमित रही। लेकिन 1937 में भारतीय फिल्मों के इतिहास में एक ऐसा मोड़ आया जिसने परदे पर रंगों का जादू बिखेर दिया। इस ऐतिहासिक बदलाव की वजह बनी फिल्म किसान कन्या, जिसे भारत की पहली स्वदेशी रंगीन फिल्म माना जाता है।

किसान कन्या का निर्देशन मोती बी. गिडवानी ने किया था और इसके निर्माता थे अर्देशिर ईरानी — वही फिल्मकार जिन्होंने भारत की पहली टॉकी फिल्म आलम आरा (1931) बनाई थी। यह फिल्म सिनेकलर तकनीक में शूट की गई थी, जो उस दौर की अत्याधुनिक रंगीन तकनीक थी और इसे जर्मनी से मंगाया गया था। उस समय रंगीन फिल्म बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण और महंगा काम था। फिल्म की रीलों को प्रोसेसिंग और एडिटिंग के लिए विदेश भेजना पड़ता था और फिर उन्हें वापस भारत लाया जाता था।
फिल्म की कहानी एक गरीब किसान की बेटी यानी “किसान कन्या” के इर्द-गिर्द घूमती थी। यह कहानी ग्रामीण भारत के संघर्ष, उम्मीदों और भावनाओं को गहराई से दर्शाती थी। रंगों के साथ यह भावनात्मक कथा जब परदे पर उतरी, तो दर्शकों के लिए यह किसी जादू से कम नहीं थी। उस समय के लोगों ने पहली बार सिनेमा को रंगों में देखा यह अनुभव उनके लिए अभूतपूर्व था।
हालांकि, फिल्म की सीमित स्क्रीनिंग और उच्च उत्पादन लागत के कारण किसान कन्या बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल नहीं कर सकी। फिर भी, यह फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर बन गई। इसने भारतीय फिल्मकारों को यह भरोसा दिलाया कि रंगीन सिनेमा अब किसी सपने जैसा नहीं रहा। आगे चलकर आन (1952) जैसी फिल्मों ने इसी राह पर चलते हुए भारत में रंगीन सिनेमा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
दिलचस्प बात यह है कि उस समय प्रसिद्ध फिल्मकार वी. शांताराम भी भारत की पहली रंगीन फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन तकनीकी देरी के चलते उनकी परियोजना पूरी नहीं हो पाई। इस तरह किसान कन्या ने भारतीय सिनेमा को रंगों की दुनिया में प्रवेश कराने का ऐतिहासिक गौरव अपने नाम कर लिया, एक ऐसा क्षण जिसने भारतीय फिल्म इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया।

