राजनीति के लिए नेताओं के पास डिग्री हो न हो न्याय करने की नियत होनी चाहिए – डॉ. धर्मेन्द्र कुमार यादव, सहायक प्राचार्य, विश्वविद्यालय गणित विभागललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा, बिहार

दरभंगा14 सितम्बर (राजेश झा) मार्क्सवाद कहता है कि राजनीति वर्गीय समाज की देन है. यथार्थवादी नजरिया इससे अलग नहीं हो सकता है और भारतीय सन्दर्भ में तो यह बिलकुल नहीं हो सकता है. भारत में तक़रीबन 6743 जातियां एवं 8 से ज्यादा प्रमुख धर्म है. सभी के अपने स्वार्थ हैं क्योंकि समाज और व्यक्ति में कुछ खास अंतर नहीं होता है. जो व्यक्ति का सोच होता है वही समाज या वर्ग के सोच को निर्धारित करता है. टॉमस होब्स कहते हैं कि व्यक्ति अपने स्वाभाव में स्वार्थी, डरपोक, दम्भी तथा झगड़ालू है. अच्छाई बुराई वस्तुओं में नहीं अपितु मानव स्वभाव में होता है. अतः राजनीति भी मानव स्वाभाव की देन है और राजनेताओं द्वारा किया गया कर्म या कुकर्म उनके अनुयायियों के स्वाभाव पर निर्भर करेगा और करता भी है. लेकिन दम्भी होने के कारण मानव स्वभाव शोषण करने को भी अपना नैतिक अधिकार समझ लेते हैं और इस कुकर्म को वो निति अनीति धार्मिक ग्रंथों आदि का हवाला देकर उचित ठहराने से भी पीछे नहीं हटते हैं.


स्वार्थ की सीमा जब चरम पर होता है तो व्यक्ति अपने समाज के मूल्यों को अन्य समाज पर स्थापित करना चाहता है. जो भारत में जाति धर्म की लड़ाई है या विश्व में जो धर्म की लड़ाई चल रही है वो यही तो कर रहा है. भला एक पढ़ा लिखा राजनेता जाति धर्म को क्यों बढ़ाना चाहता है? आदर्शवाद कहता है कि राजनीति का उद्देश्य समाज के विभिन्न समूहों के परस्पर हितों में सामंजस्य स्थापित करना होता है. विभिन्न समूहों के बिच राष्ट्रिय संपत्तियों का, राष्ट्रिय आय का, राष्ट्रिय संसाधनों का उचित बटवारा करना है न कि अपने समूह का सभी राष्ट्रिय संपत्तियों एवं आय पर वर्चस्व स्थापित करना है. पढ़े लिखे लोग अनपढ़ों से ज्यादा स्वार्थी होते हैं और अन्य समाज के प्रति उनकी दुर्भावना अनपढ़ों से ज्यादा होती है ऐसा मेरा पैतीस साल का व्यक्तिगत सामाजिक राजनितिक व्यावसायिक अनुभव कहता है.
फिर राजनीति में डिग्री का क्या स्थान रह जाता है? क्या डिग्री लेने के बाद इन्सान स्वार्थ से दूर हो पता है? क्या डिग्रीधारी इन्सान संवेदना को अपना पाता है? क्या कोई डिग्री किसी इन्सान को न्यायप्रिय होने की गारंटी देता है? बिहार में 1978 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़े वर्गों को न्याय दिलवाने के लिए आरक्षण की बात की तो पढ़े लिखे डिग्रीधारियों ने उन्हें और उनके परिवार को माँ बहन की गालियां दी. देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री वी. पी. सिंह ने जब पिछड़े वर्गों के लिए 27 फीसदी आरक्षण की घोषणा किये तो स्वयं उनके लोगों ने भी उन्हें भद्दी भद्दी गलियां दी. पूर्व केन्द्रीय शिक्षा मंत्री रहते हुए जब श्री अर्जुन सिंह ने केन्द्रीय शिक्षण संस्थानों में 27 फीसदी आरक्षण की घोषणा की तो उन्हें गालियाँ दी गयी. स्वयं उन दोनों के अपने समाज के डिग्रीधारियों ने उन्हें गालियाँ दीं. क्या मानव स्वाभाव डिग्री पाने के बाद इतना ज्ञानी हो जाता है कि दूसरों का अधिकार भी उनका अपना अधिकार दिखाई देने लगता है? वहीँ जब वर्तमान केंद्र सरकार ने संविधान और कानून की परवाह किये बिना अन्याय पूर्ण तरीके से 10 फीसदी आरक्षण सामान्य वर्गों के गरीब लोगों के लिए लागु किया तो किसी भी डिग्रीधारी के पेट में मरोड़ तक नही हुआ.
एक बात गौर करने लायक है कि राजनीति कोई नौकरी नहीं है जिसके लिए निम्नतम योग्यता की जरुरत पड़े. भारत दो प्रमुख वर्गों में विभाजित है: शासक और शोषित. देश की शोषित अघोषित संपत्तियों पर तक़रीबन 10 फीसदी शासक आबादी का 89 फीसदी कब्ज़ा है जबकि 90 फीसदी शोषितों का मुश्किल से 11 फीसदी पर कब्ज़ा है. देश की आजादी से पहले की बात हो या फिर आजादी के बाद की बात हो, स्थितियां लगभग बराबर यही रही है. देश की आजादी के पहले भी और बाद में भी शासक वर्गों के डिग्रीधारियों ने 90 फीसदी के अधिकारों की चिंता कभी की हीं नहीं. हाँ कुछ अपवाद जरुर देश के पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरु एवं उनकी पुत्री एवं प्रधानमंत्री अपने पद पर रहते हुए आम नागरिक के जीवन में सुधार के लिए कुछ कोशिश किये लेकिन शासक वर्गों के लॉबी ने इसे सफल होने नहीं दिया.
भारत के सन्दर्भ में राजनीति एक सामाजिक संघर्ष है जिसमें शासक वर्ग शोषित वर्ग को अपने सामने खुश देखना नहीं चाहते हैं. शासक वर्ग के लोग कूटनीति में माहिर होते है और शोषित वर्ग में से हीं अपने लिए एक मोहरा चुन लेते हैं जो शोषित होने के दावे कर के शोषितों का मत तो ले लेता है लेकिन काम शासकों का करता है. शोषित वर्ग के लोग जो विभिन्न समूहों को अधिकार दिलाने की लड़ाई लड़ता है और शासक वर्गों को अपना खुला दुश्मन बना लेता है उसे शासक विभिन्न तरीके से जलील करता है उसे बदनाम करता है उलुल जुलूल बातें करता है ताकि शोषित वर्ग के मतदाता बहके और उन्हें वोट न करें. इसके बहाने शासक वर्ग शोषित वर्ग को किसी भी क्षेत्र में पनपने नहीं देना चाहता है. किसी व्यक्ति के पास डिग्री का होना या नहीं होना इसी कूटनीति का हिस्सा है जबकि लोकतंत्र में नेताओं को न्याय बाँटना होता है नौकरी बाँटना होता है अधिकार बाँटना होता है न कि किसी कंपनी में बैठ कर वस्तु उत्पादन करना. इसीलिए यह कहना तर्कपूर्ण है कि राजनीति में डिग्री नहीं न्याय करने की नियत होनी चाहिए क्योंकि लोकतान्त्रिक राजा (मुख्यमंत्री हो या प्रधानमंत्री) से न्याय और अधिकार पाने के लिए जनता वोट करता है और उसे अपना राजा बनाता है. क्योंकि मार्क्सवाद कहता है कि राजनीति वर्गीय समाज की देन है तथा इन पर परस्पर विरोधी वर्गों के आपसी संघर्षों के उन्मूलन पर हीं नागरिक के एक समृद्ध समाज की स्थापना संभव होगी. स्पस्ट है कि एक समृद्ध समाज के निर्माण के लिए डिग्री नहीं एक संघर्ष विहीन समाज की जरुरत है जिसे सिर्फ न्यायप्रिय लोकतान्त्रिक राजा हीं कर सकता है और इसे कभी कोई शक्तिशाली शासक वर्ग नहीं कर सकता हैं.

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