
भोजपुर (अशोक “अश्क”) जिले के पिरो प्रखंड अंतर्गत मध्य विद्यालय खननीकलां में मिड-डे मील खाने से 50 से अधिक बच्चे बीमार हो गए। जांच में पाया गया कि बच्चों को जो भोजन परोसा गया था, उसमें मरी हुई छिपकली मिली थी। इस गंभीर लापरवाही के बाद जिले में हड़कंप मच गया। घटना के बाद शिक्षा विभाग ने त्वरित कार्रवाई करते हुए स्कूल के प्रभारी प्रधानाध्यापक गुप्तेश्वर राम और शिक्षिका रंभा कुमारी को निलंबित कर दिया है। दोनों को विभागीय कार्यवाही के अधीन भी रखा गया है। घटना के संबंध में बताया गया कि मंगलवार को विद्यालय में एनजीओ द्वारा आपूर्ति किए गए मध्याह्न भोजन में चावल और दाल तड़का परोसा गया था। भोजन करने के कुछ ही मिनटों बाद एक छात्रा की हालत बिगड़ने लगी और वह मुंह से झाग छोड़ने लगी। इसके बाद अन्य बच्चों को भी उल्टी, दस्त और चक्कर की शिकायत होने लगी। इससे पूरे विद्यालय परिसर में अफरा-तफरी मच गई। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्कूल प्रशासन ने तत्काल ब्लॉक शिक्षा पदाधिकारी मनोज सिंह को सूचना दी, जो मौके पर पहुंचे। बीमार बच्चों को निजी वाहनों और एंबुलेंस के जरिए नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों की टीम ने तत्काल इलाज शुरू किया, जिससे बच्चों की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हुआ।
बाद में जब भोजन के बर्तन की जांच की गई, तो एक बड़े बर्तन में मरी हुई छिपकली उबली हुई अवस्था में पाई गई। इससे यह आशंका जताई जा रही है कि भोजन पकते समय ही छिपकली उसमें गिर गई थी। इस खतरनाक लापरवाही के चलते बच्चों की जान जोखिम में पड़ गई। बीमार बच्चों में कंचन कुमारी, अंजली कुमारी, काजल कुमारी, आयुष कुमार, राहुल कुमार, प्रीति कुमारी, धनवंती कुमारी और अन्य छात्र-छात्राएं शामिल हैं। इस पूरे मामले में जिला शिक्षा पदाधिकारी मानवेन्द्र कुमार राय के निर्देश पर जिला कार्यक्रम पदाधिकारी रमेश पाल ने कार्रवाई करते हुए दोनों जिम्मेदार शिक्षकों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। हालांकि, विभाग ने इस मामले में मिड-डे मील आपूर्ति करने वाले एनजीओ को क्लीन चिट दे दी है, जिससे स्थानीय लोगों में नाराजगी देखी जा रही है। बता दें कि भोजपुर जिले में यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी बच्चों के भोजन से जुड़ी लापरवाही की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। अक्सर जांच के नाम पर कुछ लोगों पर कार्रवाई कर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है, लेकिन सिस्टम में कोई ठोस सुधार नजर नहीं आता। अब देखना होगा कि इस बार प्रशासन इस गंभीर लापरवाही को केवल निलंबन तक सीमित रखता है या फिर बच्चों की सुरक्षा को लेकर कोई स्थायी कदम उठाता है।

