नई दिल्ली, 18 अक्टूबर(अशोक “अश्क”) सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक केस की सुनवाई के दौरान अदालती दस्तावेज के खराब अनुवाद पर गहरी नाराज़गी जताई है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि कानूनी मामलों में हर शब्द, हर अल्पविराम (कॉमा) की अहमियत होती है और अनुवाद करते समय मूल भाषा की भावना और अर्थ को सही ढंग से सामने लाना बेहद जरूरी है।

यह टिप्पणी जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने एक सिविल अपील का निपटारा करते हुए दी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने निचली अदालत के फैसले का अंग्रेज़ी अनुवाद पेश किया गया था, जो न्यायालय की नजर में मूल अर्थ को सही ढंग से नहीं दर्शा पाया।
पीठ ने कहा कि “हम अनुवाद के तरीके से असंतुष्ट हैं। जब कोई मामला अपीली अदालत में आता है, तो वहां के जजों के लिए यह जरूरी होता है कि वे लोअर कोर्ट के तर्कों और निष्कर्षों को पूरी तरह से समझ सकें। खराब अनुवाद से यह प्रक्रिया प्रभावित होती है।”
एक रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने दो टूक कहा कि अनुवाद सिर्फ भाषा का नहीं, बल्कि भावना और मंशा का भी होता है। कानूनी शब्दों के चयन और संरचना में थोड़ी सी चूक भी न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि यह कोई नया मुद्दा नहीं है। 18 मार्च 2025 के एक आदेश में भी इसी तरह की चिंता जताई गई थी, जिसमें न्यायिक दस्तावेजों में गलत अनुवाद से न्याय के प्रभावित होने की बात उठाई गई थी।
इस टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े सभी पक्षों को सचेत किया कि अनुवाद कार्य में अधिक दक्षता और संवेदनशीलता बरती जाए, ताकि न्याय की प्रक्रिया बाधित न हो।

