नई दिल्ली 28 अगस्त (अशोक “अश्क”) भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने भारत पर लगाए गए अमेरिका के 50 फीसदी टैरिफ को “बेहद चिंताजनक” करार दिया है। उन्होंने आगाह किया कि अगर भारत ने अपने व्यापारिक साझेदारों पर अत्यधिक निर्भरता जारी रखी, तो इस तरह की मुश्किलें भविष्य में भी सामने आती रहेंगी।

बुधवार से लागू हुए इस टैरिफ के तहत अमेरिका ने भारत से निर्यात होने वाले सामानों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया है। यह कदम भारत द्वारा रूस से तेल आयात करने की नीति के जवाब में उठाया गया है, जिससे अब कुल टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
इंडिया टुडे टीवी को दिए एक इंटरव्यू में राजन ने कहा, “यह एक चेतावनी है। हमें किसी एक देश पर बहुत अधिक निर्भर नहीं रहना चाहिए। हमें पूर्व की ओर, यूरोप की ओर, अफ्रीका की ओर देखना चाहिए और ऐसे सुधार लागू करने चाहिए जो हमें 8 से 8.5% की विकास दर प्राप्त करने में मदद करें, ताकि युवाओं को रोजगार मिल सके।”
राजन ने अमेरिका के साथ व्यापार बनाए रखने की आवश्यकता को भी स्वीकार किया, लेकिन साथ ही रूस से तेल आयात की नीति पर पुनर्विचार करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि रिफाइनर तो भारी मुनाफा कमा रहे हैं, लेकिन निर्यातक कंपनियां इस नीति की कीमत टैरिफ के रूप में चुका रही हैं। “अगर इससे हमें अधिक लाभ नहीं मिल रहा है, तो यह सोचने की जरूरत है कि क्या यह रणनीति जारी रखनी चाहिए,” उन्होंने कहा।
राजन ने जोर देकर कहा कि आज के वैश्विक परिदृश्य में व्यापार, निवेश और वित्त को हथियार बना दिया गया है। उन्होंने चेताया कि भारत को अपने आपूर्ति स्रोतों और निर्यात बाजारों में विविधता लानी चाहिए। उन्होंने चीन से तुलना करते हुए कहा कि यह सिर्फ निष्पक्षता का सवाल नहीं है, बल्कि यह एक भू-राजनीतिक चुनौती है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री रहे राजन ने इस संकट को अवसर में बदलने की अपील की। उन्होंने कहा, “चीन, जापान, अमेरिका या किसी अन्य देश के साथ व्यापार ज़रूरी है, लेकिन उन पर निर्भरता नहीं होनी चाहिए। हमें विकल्प तैयार करने होंगे, और जहाँ तक संभव हो आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता देनी होगी।”
राजन ने अमेरिकी टैरिफ को भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों के लिए झटका बताया और चिंता जताई कि इसका असर विशेष रूप से झींगा किसान, कपड़ा निर्माता जैसे छोटे निर्यातकों पर पड़ेगा। इससे उनकी आजीविका खतरे में आ सकती है। साथ ही, उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह कदम अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए भी नुकसानदायक होगा, जिन्हें अब भारतीय उत्पादों के लिए 50 फीसदी अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी।
अंत में, उन्होंने भारत में व्यापार सुगमता, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बेहतर एकीकरण और घरेलू उद्योगों के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के लिए संरचनात्मक सुधारों पर बल दिया।

