केरल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पाकिस्तान में जन्मी दो बहनों को भारतीय नागरिकता देने से इनकार

नई दिल्ली, 5 सितम्बर (अशोक “अश्क”) केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पाकिस्तान में जन्मी दो बहनों को भारतीय नागरिकता देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के लिए आवेदकों को अपनी पाकिस्तानी नागरिकता का औपचारिक रूप से त्याग करना अनिवार्य है।


न्यायमूर्ति सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और वीएम श्याम कुमार की खंडपीठ ने केंद्र सरकार की ओर से दायर अपील को स्वीकार करते हुए एकल पीठ द्वारा दिया गया नागरिकता देने का आदेश रद्द कर दिया। खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि ‘रेनंसिएशन सर्टिफिकेट’ (नागरिकता त्याग प्रमाणपत्र) आवश्यक दस्तावेज है और इसे किसी अन्य दस्तावेज से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता।
यह मामला वर्ष 2008 से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ताओं के पिता, मुहम्मद मारूफ, मूल रूप से केरल के कन्नूर जिले के कोट्टायम-मालाबार गांव के निवासी थे। वर्ष 1977 में वे अपनी दादी के साथ पाकिस्तान चले गए थे। वहां से बाद में वे संयुक्त अरब अमीरात में काम करने चले गए। वर्षों बाद, मारूफ अपनी दो बेटियों के साथ भारत लौट आए और थालसेरी में स्थायी रूप से बस गए।
भारत लौटने के बाद दोनों बहनों ने भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन दिया। इसके समर्थन में उन्होंने पाकिस्तान हाई कमीशन से प्राप्त एनओसी प्रस्तुत किया, लेकिन पाकिस्तानी नागरिकता त्याग प्रमाणपत्र नहीं दिया। उनका तर्क था कि पाकिस्तान के कानूनों के तहत 21 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद ही यह प्रमाणपत्र जारी किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने अपने पाकिस्तानी पासपोर्ट पहले ही जमा कर दिए थे।
इस दलील को पहले एकल पीठ ने स्वीकार कर लिया था और दोनों बहनों को भारतीय नागरिकता देने का आदेश दिया था। हालांकि, खंडपीठ ने इस फैसले को पलटते हुए स्पष्ट किया कि चाहे आवेदक नाबालिग हो या वयस्क, भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के लिए विदेशी नागरिकता का कानूनी और औपचारिक त्याग अनिवार्य है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब तक पाकिस्तान की नागरिकता को पाकिस्तान सिटिजनशिप एक्ट, 1951 की धारा 14A के तहत विधिवत रूप से त्याग नहीं किया जाता, तब तक भारतीय नागरिकता की मांग वैध नहीं मानी जा सकती।
यह फैसला भारतीय नागरिकता कानूनों की सख्ती और स्पष्टता को रेखांकित करता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि भारतीय नागरिकता की प्रक्रिया सिर्फ मानवीय आधारों या व्यक्तिगत परिस्थितियों पर आधारित नहीं हो सकती, बल्कि इसके लिए सभी कानूनी शर्तों को पूरा करना आवश्यक है।
इस फैसले से न सिर्फ भविष्य में ऐसे मामलों के लिए दिशा मिलेगी, बल्कि यह भी संकेत मिलता है कि भारत नागरिकता देने के मामले में अपनी संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं से कोई समझौता नहीं करेगा।

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