पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियन का जीएसटी पर यू-टर्न, बताया क्यों कमजोर हो रहा सहकारी संघवाद

नई दिल्ली, 7 सितम्बर (अशोक “अश्क”) पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियन, जो कभी वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के प्रबल समर्थक माने जाते थे, अब इसके आलोचक बन गए हैं। उनका कहना है कि जीएसटी लागू होने के बाद राज्यों की आर्थिक स्वतंत्रता कम हुई है और इससे सहकारी संघवाद की भावना भी कमजोर हुई है। सुब्रमणियन की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।


पत्रकारों से बातचीत में सुब्रमणियन ने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि जीएसटी से राजस्व बढ़ेगा और केंद्र सरकार सहकारी संघवाद की भावना से काम करेगी। लेकिन, बीते पांच वर्षों में स्थिति इसके उलट रही है। उनका मानना है कि जीएसटी के तहत राज्यों की राजस्व पर निर्भरता केंद्र पर काफी बढ़ गई है, जिससे उनकी आर्थिक स्वायत्तता प्रभावित हो रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि अब पेट्रोलियम को जीएसटी के तहत लाने के लिए राज्यों को मनाना बेहद मुश्किल होगा, क्योंकि पेट्रोलियम उत्पादों से राज्यों को भारी टैक्स प्राप्त होता है। अगर इन्हें जीएसटी के तहत लाया जाता है तो राज्यों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
हाल ही में जीएसटी काउंसिल की 3 सितंबर को हुई बैठक में कुछ बड़े फैसले लिए गए। इसमें 5% और 18% की दोहरी कर संरचना को मंजूरी दी गई और त्योहारों से पहले लोगों को राहत देने के लिए 12% और 28% के टैक्स स्लैब हटा दिए गए। इससे हेयर ऑयल, शैंपू, साबुन, टूथब्रश, साइकिल, टेबलवेयर और किचनवेयर जैसी वस्तुएं सस्ती हो जाएंगी। ये नई दरें 22 सितंबर से लागू हो जाएगी।
राजस्व सचिव अरविंद श्रीवास्तव ने कहा कि उपभोग आधारित गणना के अनुसार इस निर्णय का शुद्ध वित्तीय प्रभाव करीब 48,000 करोड़ रुपये का होगा। हालांकि, सुब्रमणियन का अनुमान है कि जीएसटी में इन बदलावों और संभावित पेट्रोलियम समावेशन से देश को 1.5 से 2 लाख करोड़ रुपये वार्षिक का नुकसान हो सकता है, जो दीर्घकालिक आर्थिक असंतुलन पैदा कर सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि जीएसटी लागू होने के बावजूद ‘इंस्पेक्टर राज’ खत्म नहीं हुआ, बल्कि कई मामलों में और जटिल हो गया है।
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जीएसटी में और सुधार की बात कही थी, जिसके बाद जीएसटी काउंसिल ने यह अहम निर्णय लिया। अब सवाल यह है कि क्या इन सुधारों से सहकारी संघवाद मजबूत होगा या सुब्रमणियन की चेतावनी हकीकत बन जाएगी?

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