
राजेश कुमार विराटनगर (नेपाल)। नेपाल की देवभूमि पर सनातन संस्कृति, आध्यात्मिक समन्वय और सामाजिक एकात्मता का एक ऐतिहासिक अध्याय उस समय लिखा गया, जब हिन्दू स्वयंसेवक संघ, नेपाल के तत्वावधान में औद्योगिक नगरी विराटनगर में भव्य “किरात–बौद्ध–हिंदू सम्मेलन” का आयोजन सम्पन्न हुआ। यह आयोजन केवल एक धार्मिक सम्मेलन नहीं, बल्कि नेपाल की विविध आध्यात्मिक परम्पराओं, जनजातीय संस्कृतियों और सनातन मूल्यों के विराट संगम के रूप में उभरकर सामने आया।
सम्मेलन को विशेष गरिमा तब प्राप्त हुई जब इसमें श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ अनन्तश्रीविभूषित जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज का पावन सान्निध्य प्राप्त हुआ। उनके प्रेरणादायी उद्बोधन ने सम्मेलन को आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
विराटनगर आगमन पर पूज्य आचार्यश्री का श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक सम्मान के साथ स्वागत किया गया। विमानतल से सीधे वे समाजसेवियों एवं स्थानीय गणमान्य नागरिकों के आवास पर पहुँचे, जहाँ पुष्पमालाओं, अंगवस्त्रों और वैदिक परम्पराओं के साथ उनका अभिनन्दन किया गया। इस अवसर पर हिन्दू स्वयंसेवक संघ नेपाल के राष्ट्रीय सह-संपर्क प्रमुख महेन्द्र साह सहित अनेक कार्यकर्ताओं ने आयोजन की व्यवस्थाओं और समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके सहयोग से कार्यक्रम अत्यंत व्यवस्थित और सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। आयोजकों के अनुसार सम्मेलन में लगभग 20 हजार से अधिक श्रद्धालु,साधक,विभिन्न जनजातीय समुदायों के प्रतिनिधि,धर्माचार्य एवं सामाजिक नेतृत्वकर्ता शामिल हुए। विविध वेशभूषाओं,भाषाओं और परम्पराओं से सुसज्जित यह जनसमूह नेपाल की सांस्कृतिक विविधता और सनातन एकात्मता का प्रतीक बन गया। सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय बौद्ध महासंघ,नेपाल, किरात धर्म परम्परा के प्रतिनिधियों, विभिन्न सामाजिक संगठनों एवं धार्मिक संस्थाओं के प्रमुखों की उपस्थिति रही। नेपाल सरकार के पर्यटन मंत्री सहित कई जनप्रतिनिधियों एवं प्रशासनिक अधिकारियों ने भी कार्यक्रम में सहभागिता की। अपने उद्बोधन में पूज्य आचार्यश्री ने वेदान्त के अद्वैत दर्शन को सरल भाषा में प्रस्तुत करते हुए कहा कि “समस्त सृष्टि में एक ही परम चेतना विद्यमान है।” उन्होंने उपनिषद के महावाक्य “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” का उल्लेख करते हुए कहा कि नाम, रूप,भाषा और उपासना की विविधता के पीछे एक ही शाश्वत सत्य कार्यरत है। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म की सबसे बड़ी शक्ति उसकी समावेशी दृष्टि है, जहाँ वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध, किरात तथा प्रकृति उपासक सभी को समान सम्मान प्राप्त है। विविधता विभाजन नहीं बल्कि सांस्कृतिक समृद्धि और आध्यात्मिक विस्तार का आधार है।
आचार्यश्री ने उपस्थित जनसमूह को वैदिक मंगलकामना “लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु” का संदेश देते हुए कहा कि संपूर्ण मानवता के सुख, शांति और कल्याण की भावना ही भारतीय संस्कृति और सनातन परम्परा का मूल आधार है। सम्मेलन का उद्देश्य विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक समुदायों के मध्य संवाद, आत्मीयता और सहयोग को मजबूत करना तथा उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना बताया गया। इस दौरान पूज्य आचार्यश्री के करकमलों से हिन्दू स्वयंसेवक संघ, नेपाल के विराटनगर स्थित नवीन कार्यालय का उद्घाटन भी सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम के समापन के बाद विराटनगर के मारवाड़ी एवं महेश्वरी समाज द्वारा पूज्य आचार्यश्री का भव्य अभिनन्दन किया गया। यह सम्मेलन नेपाल में धार्मिक चेतना, सांस्कृतिक एकता, जनजातीय समरसता और सनातन दर्शन के सार्वभौमिक संदेश का एक महत्वपूर्ण अध्याय बनकर उभरा तथा यह संदेश देकर गया कि विविधताओं में निहित एकात्मता ही समाज और मानवता की वास्तविक शक्ति है।
















