सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशों पर मतभेद: जस्टिस विपुल पंचोली की पदोन्नति पर जस्टिस बीवी नागरत्ना ने जताई कड़ी आपत्ति

नई दिल्ली (अशोक “अश्क”) सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आलोक अराधे और पटना हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस विपुल मनुभाई पंचोली को शीर्ष अदालत में नियुक्त करने की सिफारिश केंद्र सरकार से की है। हालांकि, इस प्रक्रिया में एक असामान्य और अहम घटनाक्रम तब सामने आया जब कॉलेजियम में शामिल वरिष्ठ न्यायाधीश और शीर्ष अदालत की एकमात्र महिला न्यायाधीश जस्टिस बीवी नागरत्ना ने जस्टिस पंचोली की नियुक्ति पर कड़ा विरोध दर्ज कराया।


पांच सदस्यीय कॉलेजियम में मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस नागरत्ना शामिल हैं। इनमें से चार सदस्यों ने जस्टिस पंचोली की पदोन्नति का समर्थन किया, जबकि जस्टिस नागरत्ना ने इसका कड़ा विरोध किया और एक विस्तृत असहमति नोट दर्ज कराया।
जस्टिस नागरत्ना ने अपने असहमति पत्र में लिखा कि जस्टिस पंचोली की शीर्ष अदालत में नियुक्ति “न्याय के प्रशासन के लिए अनुपयुक्त” है और इससे “कॉलेजियम प्रणाली की विश्वसनीयता को नुकसान” पहुंच सकता है। उन्होंने विशेष रूप से जुलाई 2023 में जस्टिस पंचोली के गुजरात हाई कोर्ट से पटना हाई कोर्ट स्थानांतरण की परिस्थितियों का उल्लेख किया, जिसे उन्होंने “सामान्य तबादला” न मानते हुए “उच्चस्तरीय विचार-विमर्श के बाद लिया गया निर्णय” बताया।
नागरत्ना ने इस बात पर भी जोर दिया कि जस्टिस पंचोली के ट्रांसफर से पहले कई जजों से राय ली गई थी और उन सबने ट्रांसफर का समर्थन किया था। उन्होंने कॉलेजियम से आग्रह किया कि जस्टिस पंचोली से जुड़े गोपनीय दस्तावेजों की दोबारा समीक्षा की जाए।
जानकारों के मुताबिक, मई 2024 में जब पहली बार जस्टिस पंचोली के नाम पर चर्चा हुई थी, तब भी जस्टिस नागरत्ना ने अपनी असहमति जताई थी। उस समय गुजरात हाई कोर्ट के जस्टिस एनवी अंजारिया, जो जस्टिस पंचोली से वरिष्ठ हैं, उनके नाम की सिफारिश की गई थी।
महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर केंद्र सरकार जस्टिस पंचोली की नियुक्ति को मंजूरी देती है तो वे 3 अक्टूबर 2031 को भारत के प्रधान न्यायाधीश का पद संभाल सकते हैं और 27 मई 2033 तक सेवा में रहेंगे। वे जस्टिस जॉयमाल्या बागची के सेवानिवृत्त होने के बाद यह जिम्मेदारी ग्रहण करेंगे।
इस घटनाक्रम ने कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता, निष्पक्षता और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। जस्टिस बीवी नागरत्ना का विरोध न केवल एक कानूनी असहमति है, बल्कि यह न्यायिक नियुक्तियों में जवाबदेही और नैतिक मानकों की मांग का भी प्रतीक बनता जा रहा है।

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