बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के सबसे बड़े चाणक्य हैं महाशय मुकेश साहनी

नई दिल्ली, 26 अक्टूबर (अशोक “अश्क”) बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का माहौल गर्म है। सत्ता की जंग में चाहे एनडीए सरकार बने या महागठबंधन, एक या दो उपमुख्यमंत्री का फार्मूला इस बार भी तय माना जा रहा है। सीटों का बंटवारा हो चुका है और सभी दल अब पूरे जोश के साथ प्रचार में जुट गए हैं। मगर चुनावी शोर-शराबे के बीच एक नाम खास चर्चा में है — मुकेश साहनी, जो महागठबंधन की ओर से उपमुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि साहनी की पार्टी को 15 सीटें मिली हैं, लेकिन वे खुद किसी भी सीट से विधायक उम्मीदवार नहीं हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर महागठबंधन की सरकार बन भी जाती है तो मुकेश साहनी उपमुख्यमंत्री कैसे बनेंगे? यही समझने की जरूरत है कि उन्होंने किस तरह राजनीतिक शतरंज की बिसात बिछाई है।


मुकेश साहनी की इस रणनीति को कई लोग “चाणक्य नीति” कह रहे हैं। उन्होंने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। एक ओर तो उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को 15 सीटें सौंपकर यह संदेश दिया कि वे व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर संगठन के विकास के लिए समर्पित हैं। इससे उनके समर्थक तो गदगद हैं, वहीं जनता भी उन्हें एक उदार नेता के रूप में देख रही है।


लेकिन राजनीति सिर्फ उदारता से नहीं चलती। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि साहनी ने यह कदम सोच-समझकर उठाया है। अगर वे खुद चुनाव लड़ते, तो चुनावी खर्च में कई जटिलताएँ आ सकती थीं। अब उनके कार्यकर्ता भी प्रसन्न हैं और पार्टी का आर्थिक समीकरण भी संतुलित बना हुआ है।
अब अगर महागठबंधन की सरकार बनती है, तो साहनी अपने राजनीतिक कद और रणनीति के बल पर उपमुख्यमंत्री पद के लिए दबाव बना सकते हैं। संविधान के अनुसार वे छह महीने तक बिना विधायक बने मंत्री या उपमुख्यमंत्री रह सकते हैं। इस अवधि में या तो महागठबंधन किसी सीट से किसी विधायक से इस्तीफा दिलाकर उन्हें चुनाव लड़ाएगा या फिर उन्हें एमएलसी बनाया जाएगा। दोनों ही स्थितियों में साहनी को फायदा है— या तो एक विधानसभा सीट बढ़ेगी या एक विधान परिषद सीट।
हालाँकि इसका असर जनता पर पड़ना तय है। अगर किसी सीट पर उपचुनाव होता है तो वहाँ के मतदाताओं को फिर से चुनावी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। और जनता पर थोड़ी महंगाई की मार पड़ेगी। वहीं, अगर साहनी एमएलसी बनते हैं तो महागठबंधन पर यह दबाव रहेगा कि उन्हें हर हाल में जीत दिलाई जाए, चाहे इसके लिए कोई भी राजनीतिक कीमत क्यों न चुकानी पड़े।
अंततः सवाल यही है कि इस पूरी राजनीतिक रणनीति का लाभ बिहार की जनता को कितना मिलेगा और नुकसान कितना। लेकिन इतना तो तय है कि मुकेश साहनी ने चुनावी मैदान में अपनी चालें ऐसी चली हैं कि जीत-हार चाहे जिसकी हो, चर्चा उनके नाम की ही होगी।

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